किसी की याद को हम कितना सहेज कर रखते हैं न
जैसे समंदर से लौटते हुए पैरों की उँगलियों के बीच लगी रेत
बचा लाये हों
या मुलाक़ात की शाम के उस अमलतास का पीला रंग
अपने कंगन में मिला लाये हों
जैसे सालगिरह के दिन उसकी दी दुआ बाँध ली हो कसकर
अपने दुपट्टे की कोर से....
कैसे ज़हन की किताब में उसे बुकमार्क बनाकर रख लेते हैं न
उस गुलाब की तरह जो नहीं दे पाये थे उसे
पर तब क्या जब वो सिर्फ भ्रम हो!!
फ़िर भी याद बनकर बीत रहा हो आपमें पल-पल.…
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आरती
२५/६/१४
बेहतरीन।
ReplyDeleteयह भ्रम नहीं टूटता सांसों के टूटने तक ।
bahut abhaar aapka..
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