Sunday, June 8, 2014

एहसासोँ का चेहरा

कैलेँडर पर एक तारीख़ को क़ैद किया था तुमने

नीले रंग की स्याही से 
घेर ली थीँ..
उस दिन की यादेँ

ताकि फांद न पाएँ 
ज़हन की दिवारेँ

मेज़ पर बेतरतीब
बिखरी पड़ी हैँ
तुम्हारी-मेरी बातेँ

ठीक एक बरस पुरानी चाय से
धुआं उठता देख रही हूँ

अख़बार की कतरनोँ पर
तुम्हारी उँगलियोँ की छाप
आज भी सहला जाती हैँ

सफ़ेद कुर्ते पर
स्याही के छीँटेँ
कुछ और गहरा गए हैँ

आसमानी बूँद बनकर
आज फ़िर
मेरे एहसासोँ का चेहरा
छू गए हो तुम..

(आरती)

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