Sunday, June 1, 2014

मैं बुद्ध हो जाउंगी
















एक सुबह जब मैं उठूंगी
मेरी बगल की मेज़ पर रखे प्याले से भाप उठ रही होगी।
ये आधी रात में बनाई ब्लैक कॉफ़ी से उठती भाप होगी।
जो उम्र की सड़क पर एक युग के अवसान को चिन्हित करेगी।

एक सुबह जब मैं उठूंगी
मेरे सिरहाने ऊंघ रहा होगा मार्खेज़ की किसी कहानी का कोई किरदार
जो  रात भर मेरी आँखों की किताब में जागता रहा था।  


एक सुबह जब मैं उठूंगी
शोध का विषय बनेगा दीवार से टंगा, एक अबूझ पहेली सरीखा…
मोनालिसा की मुस्कान की तरह रहस्यमयी, अनसुलझा मेरा जीवन।


एक सुबह जब मैं उठूंगी
मैं लौट रही होउंगी लुम्बिनी, कपिलवस्तु, बोधगया की यात्रा से.…
मेरे सिर पर बोधि वृक्ष की छाया होगी और चेहरे पर बेतरह फैला होगा सुकून
उस दिन मैं बुद्ध हो जाउंगी।

-आरती
(१/६/१४)

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