आवाज़ के समंदर में गोते लगाते हुए
लहरों की परतों के खूब नीचे
कल एक सिक्का हाथ लगा
किसी ने शोर के सबसे ऊँचे माले से फेंका था उसे
उसमें बंधी थीं बेशुमार चुप्पियाँ
वो तमाम आवाज़ें जो नहीं पहुँच पायी थीं किसी तक
मैंने हाथ में लेकर प्यार से सहलाया उसे
और खूब ताकत के साथ वापिस उछाला है
उसी हलक में.… एक दुआ के साथ
'अगली दफे फ़िर.… कभी न मिलना यहाँ।'
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आरती
७/६/१४
लहरों की परतों के खूब नीचे
कल एक सिक्का हाथ लगा
किसी ने शोर के सबसे ऊँचे माले से फेंका था उसे
उसमें बंधी थीं बेशुमार चुप्पियाँ
वो तमाम आवाज़ें जो नहीं पहुँच पायी थीं किसी तक
मैंने हाथ में लेकर प्यार से सहलाया उसे
और खूब ताकत के साथ वापिस उछाला है
उसी हलक में.… एक दुआ के साथ
'अगली दफे फ़िर.… कभी न मिलना यहाँ।'
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आरती
७/६/१४
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