जज़्बातों का दरिया, लफ़्ज़ों के लिबास.....
मैं बस अहसास लिखती हूँ। शब्द महज़ लिबास भर हैँ।
Monday, June 16, 2014
बहुत ग़ुज़र कर भी..
कुछ तो है जो ठहर जाता है
उसके जाने के बाद मुलाक़ातोँ की पीठ पर जैसे
इंतज़ार की खरोँचेँ..
-आरती
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