रात को दिन, दिन को रात लिखा
तेरे ख़त के इंतज़ार में मैंने एक और ख़त लिखा..
शाम तरसती रही तेरे दरवाज़े पर
मैंने अपने उजड़े हुए अरमानों को आबाद लिखा..
शब् के चेहरे पे महकती हैं तेरी यादें
मैंने अपने सुलगते चश्म को आब लिखा..
छत से गुज़री थी अभी तू सबा बन कर
मैंने साँसों पे तेरी अपनी साँसों का पता लिखा..
तेरी तस्वीर में मिला करता हूँ मैं इन दिनों
मैंने अपने वजूद को ही तेरे नाम लिखा...
रात को दिन, दिन को रात लिखा
तेरे ख़त के इंतज़ार में मैंने एक और ख़त लिखा..
-(आरती)
२६/३/१४
तेरे ख़त के इंतज़ार में मैंने एक और ख़त लिखा..
शाम तरसती रही तेरे दरवाज़े पर
मैंने अपने उजड़े हुए अरमानों को आबाद लिखा..
शब् के चेहरे पे महकती हैं तेरी यादें
मैंने अपने सुलगते चश्म को आब लिखा..
छत से गुज़री थी अभी तू सबा बन कर
मैंने साँसों पे तेरी अपनी साँसों का पता लिखा..
तेरी तस्वीर में मिला करता हूँ मैं इन दिनों
मैंने अपने वजूद को ही तेरे नाम लिखा...
रात को दिन, दिन को रात लिखा
तेरे ख़त के इंतज़ार में मैंने एक और ख़त लिखा..
-(आरती)
२६/३/१४
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