तेरे हाथों का मस अब भी
मेरी शामों में घुला लगता है
जब छत पर धूप की गिरहें बंध रहीं होती हैं
तू गुलाबी आँचल
मेरी तार पर बिछाए दिखती है
मैं अपने चेहरे पर उसे पहन लेता हूँ
दो घड़ी ही सही जी लेता हूँ..........
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-आरती
३०/१/२०१४
मेरी शामों में घुला लगता है
जब छत पर धूप की गिरहें बंध रहीं होती हैं
तू गुलाबी आँचल
मेरी तार पर बिछाए दिखती है
मैं अपने चेहरे पर उसे पहन लेता हूँ
दो घड़ी ही सही जी लेता हूँ..........
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-आरती
३०/१/२०१४
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