जब एक रचनाकार अपने ही रचे किसी किरदार से प्रेम करने लगता है..तो वो वास्तविकता और भ्रम के बीच किसी पैंडुलम की तरह झूलता रहता है..
वो जानता है कि उसका अस्तित्व सिर्फ किताब के पन्नों के बीच सीमित है..या फिर उसके भीतर..मन के किसी कोने में महकती कस्तूरी की भाँति..जिसे वो बाहर की दुनिया में खोजता रहता है..
ऐसा ही तो होता है.....एकतरफा प्रेम.......
फ़र्क़ बस इतना है कि एक भ्रम होकर भी वास्तविक है..और दूसरा वास्तविक होकर भी भ्रम है...
(आरती)
वो जानता है कि उसका अस्तित्व सिर्फ किताब के पन्नों के बीच सीमित है..या फिर उसके भीतर..मन के किसी कोने में महकती कस्तूरी की भाँति..जिसे वो बाहर की दुनिया में खोजता रहता है..
ऐसा ही तो होता है.....एकतरफा प्रेम.......
फ़र्क़ बस इतना है कि एक भ्रम होकर भी वास्तविक है..और दूसरा वास्तविक होकर भी भ्रम है...
(आरती)
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