रात मेंह बरस रहा था
कितनी ही देर भीगती रही थी मैं
बिना भीगे...
कई निवाले निगल गई थी मैं
तुम्हारे और मेरे बीच पसरे
उन मूक क्षणों के…
हथेली में भर-भर जमा करनी चाही थी मैंने
तुम्हारी चुप्पियाँ
ताकि समझ सकूँ तुम्हारी ख़ामोशी का शब्दकोश
तुम ही ने कहा था न
" किसी का इंतज़ार है तुम्हारे शब्द...शायद !! "
तो क्यों न इस बार किरदार बदल लिए जाएँ
आपस में…
अबकि इंतज़ार "मेरा" हो
और शब्द "तुम्हारे"………।
------------------------
आरती
१/७/१४
कितनी ही देर भीगती रही थी मैं
बिना भीगे...
कई निवाले निगल गई थी मैं
तुम्हारे और मेरे बीच पसरे
उन मूक क्षणों के…
हथेली में भर-भर जमा करनी चाही थी मैंने
तुम्हारी चुप्पियाँ
ताकि समझ सकूँ तुम्हारी ख़ामोशी का शब्दकोश
तुम ही ने कहा था न
" किसी का इंतज़ार है तुम्हारे शब्द...शायद !! "
तो क्यों न इस बार किरदार बदल लिए जाएँ
आपस में…
अबकि इंतज़ार "मेरा" हो
और शब्द "तुम्हारे"………।
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आरती
१/७/१४
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