तेरे इंतज़ार के पन्ने पीले पड़ते रहे
मैँ वक़्त की पल्कोँ को हथेलियोँ से ढाँपे
पहने रही तेरे लफ़्ज़ोँ का लम्स
काटती रही पहाड़ की ऊँचाई
पीती रही जाने कितने समंदर
पर तुम लिपटे रहे अबोधता की चादर मेँ
मैँ..ईश्वर को अर्पित करती रही
तेरे नाम की चिट्ठियाँ..
(आरती)
मैँ वक़्त की पल्कोँ को हथेलियोँ से ढाँपे
पहने रही तेरे लफ़्ज़ोँ का लम्स
काटती रही पहाड़ की ऊँचाई
पीती रही जाने कितने समंदर
पर तुम लिपटे रहे अबोधता की चादर मेँ
मैँ..ईश्वर को अर्पित करती रही
तेरे नाम की चिट्ठियाँ..
(आरती)
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