मेरी प्रतीक्षा का छोर
तुम्हारी अबोधता से बंधा है
जो घटता नहीँ
बढ़ रहा है अनवरत
हरे से पीतवर्ण को अग्रसर
वसंत की तरह
पर तुम्हारे प्रेम मेँ मझे
रहना है यहीँ
अनंत मेँ अंत की तलाश की तरह
इसी यात्रा मेँ
जिसका कोई गंतव्य नहीँ
(आरती)
तुम्हारी अबोधता से बंधा है
जो घटता नहीँ
बढ़ रहा है अनवरत
हरे से पीतवर्ण को अग्रसर
वसंत की तरह
पर तुम्हारे प्रेम मेँ मझे
रहना है यहीँ
अनंत मेँ अंत की तलाश की तरह
इसी यात्रा मेँ
जिसका कोई गंतव्य नहीँ
(आरती)
No comments:
Post a Comment