Monday, February 29, 2016

मैँ अभिसारिका...

तुम्हारी कविता
एक पगडंडी की तरह प्रतीत होती है
जिसके सिरे पर खड़े तुम
पुकारते हो मुझे
फ़िर मैँ, मैँ नहीँ रहती 
रात के तीसरे पहर मेँ स्वप्न से उठकर
चल पड़ती हूँ तुम तक
तुम्हारे प्रेम मेँ डूबी
मैँ अभिसारिका...
(आरती)

No comments:

Post a Comment