आज मैँने चार पंक्तियाँ लिखीँ
मिटा दीँ
तीन अक्षरोँ मेँ पिरोया तुम्हारा नाम लिखा
हथेली से छिपा दिया
ढाई अक्षर लिखे
नाखून से खुरच दिए
इस मिटे,छिपे और खुरचे के बीच से उठकर
मैँने आईना देखा
अचानक मेरी शक्ल उस बच्चे की शक्ल मेँ बदल गयी
जो मुझे रेलवे प्रतीक्षालय मेँ मिला था
जिसकी पुतलियोँ मेँ ज़िँदा थी प्रतीक्षा
और प्रतीक्षा मेँ ज़िँदा थी उम्मीद...
(आरती)
मिटा दीँ
तीन अक्षरोँ मेँ पिरोया तुम्हारा नाम लिखा
हथेली से छिपा दिया
ढाई अक्षर लिखे
नाखून से खुरच दिए
इस मिटे,छिपे और खुरचे के बीच से उठकर
मैँने आईना देखा
अचानक मेरी शक्ल उस बच्चे की शक्ल मेँ बदल गयी
जो मुझे रेलवे प्रतीक्षालय मेँ मिला था
जिसकी पुतलियोँ मेँ ज़िँदा थी प्रतीक्षा
और प्रतीक्षा मेँ ज़िँदा थी उम्मीद...
(आरती)
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