तुमने फ़ूँक मारी और बुझा दिया
आँखोँ की पुतलियोँ मेँ रखा
उम्मीद का सूरज
पर माथे के ठीक बीच मेँ रखे
इंतज़ार के चाँद को
अमावस क्यूँ नहीँ बुझाती...
(आरती)
आँखोँ की पुतलियोँ मेँ रखा
उम्मीद का सूरज
पर माथे के ठीक बीच मेँ रखे
इंतज़ार के चाँद को
अमावस क्यूँ नहीँ बुझाती...
(आरती)
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