कभी बिस्तर पर
सिलवट बन गिरती है
कभी तकिये पर चढ़ा
गिलाफ भिगोती है
दिवार पर टंगी मोनालिसा के
होँठ बन जाती है
काग़ज़ पर बिछ जाती है कभी
कोई टूटी हुई नज़्म बनकर
तो कभी पांव के नीचे चुभती है
हऴक से गिरे हर्फ बनकर
सुनो! तुम्हारी चुप्पी हर लम्हा
एक नया चेहरा पहने
रौँदती है अपने तल्वोँ के नीचे
प्रेम के सबसे पवित्र प्रस्ताव
(आरती)
सिलवट बन गिरती है
कभी तकिये पर चढ़ा
गिलाफ भिगोती है
दिवार पर टंगी मोनालिसा के
होँठ बन जाती है
काग़ज़ पर बिछ जाती है कभी
कोई टूटी हुई नज़्म बनकर
तो कभी पांव के नीचे चुभती है
हऴक से गिरे हर्फ बनकर
सुनो! तुम्हारी चुप्पी हर लम्हा
एक नया चेहरा पहने
रौँदती है अपने तल्वोँ के नीचे
प्रेम के सबसे पवित्र प्रस्ताव
(आरती)
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