Friday, May 15, 2015

पवित्र प्रस्ताव

कभी बिस्तर पर
सिलवट बन गिरती है
कभी तकिये पर चढ़ा
गिलाफ भिगोती है
दिवार पर टंगी मोनालिसा के
होँठ बन जाती है
काग़ज़ पर बिछ जाती है कभी
कोई टूटी हुई नज़्म बनकर
तो कभी पांव के नीचे चुभती है
हऴक से गिरे हर्फ बनकर
सुनो! तुम्हारी चुप्पी हर लम्हा
एक नया चेहरा पहने
रौँदती है अपने तल्वोँ के नीचे
प्रेम के सबसे पवित्र प्रस्ताव
(आरती)

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