आँखोँ के भीतर
जो झीनी-सी चादर है न
स्वप्न की..
धुँधली ही सही
झिलमिलाना चाहती हूँ उस पर
तुम्हारी भीड़ का हिस्सा नहीँ
मैँ बस तुम्हारा अकेलेपन जीना चाहती हूँ
यथार्थ से परे एक मीठा भ्रम बनकर
उतरना चाहती हूँ कविता की तरह
तुम्हारे मन के पन्नोँ पर..
(आरती)
जो झीनी-सी चादर है न
स्वप्न की..
धुँधली ही सही
झिलमिलाना चाहती हूँ उस पर
तुम्हारी भीड़ का हिस्सा नहीँ
मैँ बस तुम्हारा अकेलेपन जीना चाहती हूँ
यथार्थ से परे एक मीठा भ्रम बनकर
उतरना चाहती हूँ कविता की तरह
तुम्हारे मन के पन्नोँ पर..
(आरती)
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