Friday, August 7, 2015

सूरज ढूंढ़ रही थी

रात बारिश बहुत हुई थी
ऐसी थी सुबह की सूरत
जैसे किसी माशूका के.…आंसुओं से सीले गाल
तार पर कुछ बूँदें अब भी लटकीं थीं
जैसे किसी हवा के झोंके के इंतज़ार में हों
कि आये और मिला दे उन्हें वहीँ जहाँ बाकी की बूँदें गिरी थीं

ज़रूरी नहीं कि जो हमें अच्छा लगता है, हमेशा लगे ही
जैसे मैं, जिसे बारिश बेहद पसंद है
आज भीगे आसमान पर सूरज ढूंढ़ रही थी
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आरती

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