Tuesday, August 4, 2015

काश !

रात भर आँख की खिड़की पर
लटका रहा चाँद

पलकें थीं कि मूंदने का नाम ही न लें

ये चाँद इतना दूर क्यों निकलता है ?

क्या मेरी तरह उसे भी अच्छा लगता है…
यूँ तन्हा होना 

कॉफ़ी के सिप अकेले भरना

बालकनी की रेलिंग पर अपनी ठोडी टिकाए
सड़क पर आते-जाते पैरों को देखना

बारिश में बूंदों के कांच सोख लेना

काश ! उसने कहा न होता कि
प्यार एक सपना है

मैं उस सपने को न जीती

काश ! उसने कह दिया होता कि
हरी आँखें पसंद हैं उसे

काश ! कुछ न कहा होता उसने
काश ! सब कह दिया होता उसने
-------------
आरती





   

No comments:

Post a Comment