रात भर आँख की खिड़की पर
लटका रहा चाँद
पलकें थीं कि मूंदने का नाम ही न लें
ये चाँद इतना दूर क्यों निकलता है ?
क्या मेरी तरह उसे भी अच्छा लगता है…
यूँ तन्हा होना
कॉफ़ी के सिप अकेले भरना
बालकनी की रेलिंग पर अपनी ठोडी टिकाए
सड़क पर आते-जाते पैरों को देखना
बारिश में बूंदों के कांच सोख लेना
काश ! उसने कहा न होता कि
प्यार एक सपना है
मैं उस सपने को न जीती
काश ! उसने कह दिया होता कि
हरी आँखें पसंद हैं उसे
काश ! कुछ न कहा होता उसने
काश ! सब कह दिया होता उसने
-------------
आरती
लटका रहा चाँद
पलकें थीं कि मूंदने का नाम ही न लें
ये चाँद इतना दूर क्यों निकलता है ?
क्या मेरी तरह उसे भी अच्छा लगता है…
यूँ तन्हा होना
कॉफ़ी के सिप अकेले भरना
बालकनी की रेलिंग पर अपनी ठोडी टिकाए
सड़क पर आते-जाते पैरों को देखना
बारिश में बूंदों के कांच सोख लेना
काश ! उसने कहा न होता कि
प्यार एक सपना है
मैं उस सपने को न जीती
काश ! उसने कह दिया होता कि
हरी आँखें पसंद हैं उसे
काश ! कुछ न कहा होता उसने
काश ! सब कह दिया होता उसने
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आरती
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