किसी रोज़मर्रा की दोपहर में
मेज़ पर ऊँघने लगते हैं
अधबनी कहानी के किरदार
कुर्सी से थोड़ा सरक कर
नीचे आ बैठती हैं समाधि में
साधक सी...उलझनें
सुकून से ख़ाली पुतलियाँ
ठिठक जाती हैं बुद्ध की आँखों पर
कुछ देर
गुलाबी हथेली पर कुछ रंगीन-सा आ बैठता है
मैं मुट्ठी बंद नहीं करती
इस तरह वो घटता नहीं बढ़ता जाता है
प्रतीक्षा प्रेम का सबसे सुन्दर उपहार है
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आरती
मेज़ पर ऊँघने लगते हैं
अधबनी कहानी के किरदार
कुर्सी से थोड़ा सरक कर
नीचे आ बैठती हैं समाधि में
साधक सी...उलझनें
सुकून से ख़ाली पुतलियाँ
ठिठक जाती हैं बुद्ध की आँखों पर
कुछ देर
गुलाबी हथेली पर कुछ रंगीन-सा आ बैठता है
मैं मुट्ठी बंद नहीं करती
इस तरह वो घटता नहीं बढ़ता जाता है
प्रतीक्षा प्रेम का सबसे सुन्दर उपहार है
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आरती
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