Sunday, August 16, 2015

सबसे सुन्दर उपहार

किसी रोज़मर्रा की दोपहर में
मेज़ पर ऊँघने लगते हैं
अधबनी कहानी के किरदार

कुर्सी से थोड़ा सरक कर
नीचे आ बैठती हैं समाधि में
साधक सी...उलझनें

सुकून से ख़ाली पुतलियाँ
ठिठक जाती हैं बुद्ध की आँखों पर
कुछ देर

गुलाबी हथेली पर कुछ रंगीन-सा आ बैठता है
मैं मुट्ठी बंद नहीं करती
इस तरह वो घटता नहीं बढ़ता जाता है  

प्रतीक्षा प्रेम का सबसे सुन्दर उपहार है
----------------
आरती


No comments:

Post a Comment