Monday, August 10, 2015

इमरोज़

ख़ुद में जज़्ब करके रखा मैंने
अपनी तमाम टूटन को
कभी किसी नाज़ुक लम्हे
रोई भी छुप-छुप कर
पर अश्क़ कभी पलकों से....
गिरने न दिया
नज़्म बनती रही भीतर ही भीतर
मैंने किसी कागज़ का सीना न ढूँढा
तुम किसी और से मोहब्बत करते रहे
मैं तुम्हारी इबादत
इस तरह प्यार के असल मानी…
मैंने इमरोज़ होकर जाने
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आरती

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