जज़्बातों का दरिया, लफ़्ज़ों के लिबास.....
मैं बस अहसास लिखती हूँ। शब्द महज़ लिबास भर हैँ।
Sunday, March 15, 2015
ईश्वर ने सोचा
ईश्वर ने आँखेँ सोची
पुरुष बुना
ख़्वाब सोचे
स्त्री बुनी
प्रेम सोचा
आँख की हथेली को
ख़्वाब की हथेली थमाकर
प्रेम रखा..
(आरती)
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment