Wednesday, March 4, 2015

भोर का स्वप्न

रात की पल्कोँ पर नीँद..
देर तक जागती रही थी
चाँद के डूब जाने तक
पर रात के खाके मेँ रखी
उसकी बेतरतीब बातेँ
नाकाफ़ी थीँ..
नाकाफ़ी एक उम्र के लिए
सदियोँ का फेरा था उनमेँ
जिसका सिरा खोजती रही थी मैँ
अब बस निशान रह गये हैँ बाकि
सुबह की हथेलियोँ पर...
(आरती)

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