वो इज़हार जो हऴक मेँ डूब गया
वो लफ़्ज़ जो काग़ज़ पर नहीँ गिरे
वो धुन जो किसी गीत मेँ नहीँ ठली
वो चिट्ठियाँ जो जेबोँ मेँ सिलतीँ रहीँ
वो आँखेँ जिसमेँ महबूब का अक्स ना उतरा
वो इंतज़ार जिसे मंज़िल न मिली
वो बारिश जो बहती रही अंदर
वो लफ़्ज़ जो काग़ज़ पर नहीँ गिरे
वो धुन जो किसी गीत मेँ नहीँ ठली
वो चिट्ठियाँ जो जेबोँ मेँ सिलतीँ रहीँ
वो आँखेँ जिसमेँ महबूब का अक्स ना उतरा
वो इंतज़ार जिसे मंज़िल न मिली
वो बारिश जो बहती रही अंदर
क्या कभी मिलेँगेँ इन्हेँ..
अपने सही पते
(आरती)
अपने सही पते
(आरती)
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