Wednesday, July 22, 2015

रुँधा कंठ

देह की परतों के पीछे एक जगह है
जहाँ ठहर गया है कुछ
पीड़ा , प्रेम , स्मृति
जाने कितने रसायनों से गुंथी
एक शक्ल , एक नाम  के रूप में

मन पारदर्शी नहीं…
जो दिखा पाता अपनी आहत आत्मा
सुना पाता कैसी होती है पीड़ा की ध्वनि

पर ये धुनें कहाँ होती हैं कर्णप्रिय !
क्या कोई समझ पाता है
किसी उदास कविता के पीछे की कथा

सब कुछ अपनी गति से चलता है…
बस ! मन किसी छोटे बच्चे की तरह
पड़ा रहता है झूले में...असहाय
अपना रुँधा कंठ लिए।
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आरती

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