Thursday, July 16, 2015

पनाह

पलकों ने चखा समंदर
 गालों पर बरसी हैं बूँदें
एक दुआ भर ही तो उछाली थी
उस नीली-झीनी चादर की ओर
सच है ! मनमर्ज़ियों के आगे
कहाँ टिका है कोई
किसी दर्द की बारिश में
कहाँ रुका है कोई
भीगना, बहना और डूब जाना
बस ! यही तो लिखा है...
पर मन तो फ़िर भी पनाह ढूंढता है
एक दूसरे मन की
दर्द…
एक दूसरे दर्द की
दुआ...
एक दूसरी दुआ की
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आरती
         

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