Wednesday, August 27, 2014

संवेदन शून्य

वो दिन जब रंग बिखरे हों बेतरतीब
फर्श पर
और कैनवास कोरा रह जाए

वो दिन जब ज़बान भूल जाए
लफ़्ज़ों का ज़ायका
और ख़ामोशी चखने लगे

वो दिन जब यादों से लबरेज़ हो ज़हन
बस....उसकी याद का सिरा
हाथ न लगे

वो दिन जब आँखों में न उतरे
समंदर
और नदी अपनी नमी खो दे

वो दिन जब प्रेम के हरे दिन
भूरे पड़ने लगें
और शाख पर काँपता आख़री पत्ता भी गिर जाए

वो दिन जब तुम चल दो चुप चाप
मुझसे दूर
और अपने पदचिन्ह भी मिटा दो

उस दिन उस पल हो जाऊं मैं  
संवेदन शून्य ……
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आरती
२८ /८/१४ 

6 comments:

  1. कल 30/अगस्त/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  2. भावों को बखूबी प्रस्तुत किया है आपने.

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  3. वाह मन को छू गई रचना

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  4. वाह, बहुत खूब

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