तुम्हें ढूँढ़ते हुए मैंने
पृथ्वी के जाने कितने ही
चक्कर लगाये
नदी की हर एक लहर पर चलकर
अपने समन्दर का पता पूछा
एक मुट्ठी उम्मीद की माटी लिए
पर्वत पर तेरे होने के निशान पूछे
माज़ी की धुँधलकी परतों के नीचे से छांटें
स्मृतियों के रंगीन पंख
खुबानी की नरम छाया तले
तेरे बिछे रुमाल का सिरा खोजा
पर तुम तो भींची पलकों के बीच छिपे थे
कल देर तक सोती रहीं ये आँखें
कि जो जागीं...तुम्हें खो देंगीं …
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आरती
पृथ्वी के जाने कितने ही
चक्कर लगाये
नदी की हर एक लहर पर चलकर
अपने समन्दर का पता पूछा
एक मुट्ठी उम्मीद की माटी लिए
पर्वत पर तेरे होने के निशान पूछे
माज़ी की धुँधलकी परतों के नीचे से छांटें
स्मृतियों के रंगीन पंख
खुबानी की नरम छाया तले
तेरे बिछे रुमाल का सिरा खोजा
पर तुम तो भींची पलकों के बीच छिपे थे
कल देर तक सोती रहीं ये आँखें
कि जो जागीं...तुम्हें खो देंगीं …
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आरती
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