Wednesday, August 6, 2014

तुम्हें ढूँढ़ते हुए मैंने
पृथ्वी के जाने कितने ही
चक्कर लगाये

नदी की हर एक लहर पर चलकर
अपने समन्दर का पता पूछा

एक मुट्ठी उम्मीद की माटी लिए
पर्वत पर तेरे होने के निशान पूछे

माज़ी की धुँधलकी परतों के नीचे से छांटें
स्मृतियों के रंगीन पंख

खुबानी की नरम छाया तले
तेरे बिछे रुमाल का सिरा खोजा

पर तुम तो भींची पलकों के बीच छिपे थे

कल देर तक सोती रहीं ये आँखें
कि जो जागीं...तुम्हें खो देंगीं …
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आरती 

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