ख़ाली कमरे में गूंजती रही थीं
भरी हुई कई चुप्पियाँ
कभी-कभी प्रार्थनाएँ टकरा जाती हैं
हवा में बिखरी और प्रार्थनाओं से
अंतहीन समय घिसटता रहता है
दिन, महीने, सालों के खाकों में बंटकर
कोई आवाज़ नहीं देता सदियों तक
देहलीज़ पर ठिठकी रहती हैं तितलियाँ
बारिश सूखी रह जायेंगी क्या… इस बार भी
नहीं.... प्रार्थनाएं सही जगह पर पहुँच गयीं हैं शायद
कमरे की दीवार पर अभी-अभी
कुछ गिरा है
तेरी आवाज़ की रोशनाई है शायद……………
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आरती
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