Thursday, July 10, 2014

दो अलग-अलग शहरों को
जो एक सड़क जोड़ती थी
उम्मीद की..

अब वो चौराहा हो गयी है

मेरे दुपट्टे की कोर से बंधा सिक्का
कहीं खो गया है

अब तो आसमान की आँख से भी
कोई तारा नहीं टूटता

पर्पल बोगनविलिया पर पसरी रहती है
बेरंग उदासी

पर जानते हो कल बारिश के बाद
तार पर लटकी आख़री बूँद में
तुम्हारा चेहरा दिखा था

मैंने हथेली में भर.…ओढ़ लिया है उसे

बोगनविलिया पर घोंसले बनाकर
टांग दिए हैं मैंने

दुपट्टे की कोर से बाँध लिया है
आसमान से टूटा तारा

चौराहे पर रख आयी हूँ.…
अपने पदचिन्ह

तुम उन पर पाँव रखना और लौट आना
ख़ुद से मुझ तक………
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आरती
१०/७/१४


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