मैं आज नहीं
सदियों से खड़ा हूँ
उसी दिन के ढ़लान पर
जहाँ हमारे मिलने का
वक़्त तय हुआ था
ज़हन के दराज़ से
वही बासी याद निकालकर
मैं रोज़ अपनी जेब में रखता हूँ
फिर चल देता हूँ
अपने शहर में समंदर ढूंढने
तुझे पानी पसंद था न इसलिए
मैं आज भी अपने हाथों में
सुर्ख गुलाब की ख़ुशबू ओढ़े
तेरे आमद की लहरें गिनता हूँ
और तू....
तू शाम की आँखों पर
अपना हाथ रख कर
एक और उम्मीद बुझा जाती है.....
-(आरती)
आरती जी, आपकी कविताओं में सहजता और स्वाभाविकता के साथ बड़ी बात कह देने की जो खासियत है वह उन्हें उल्लेखनीय बना देती हैं ।
ReplyDeletebahut aabhaar..
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