Monday, September 16, 2013

बासी याद


मैं आज नहीं

सदियों से खड़ा हूँ

उसी दिन के ढ़लान पर

जहाँ हमारे मिलने का

वक़्त तय हुआ था

ज़हन के दराज़ से

वही बासी याद निकालकर

मैं रोज़ अपनी जेब में रखता हूँ

फिर चल देता हूँ

अपने शहर में समंदर ढूंढने

तुझे पानी पसंद था न इसलिए

मैं आज भी अपने हाथों में

सुर्ख गुलाब की ख़ुशबू ओढ़े

तेरे आमद की लहरें गिनता हूँ

 और तू....

तू शाम की आँखों पर

अपना हाथ रख कर

एक और उम्मीद बुझा जाती है.....


-(आरती)

2 comments:

  1. आरती जी, आपकी कविताओं में सहजता और स्वाभाविकता के साथ बड़ी बात कह देने की जो खासियत है वह उन्हें उल्लेखनीय बना देती हैं ।

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