दस्तक
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कल रात जब दरवाज़े पर दस्तक हुई
मैंने कुण्डी पर हाथ रखकर कुछ माँगा था
जानते हो क्या
मैंने माँगा के काश ये तुम्हारी दस्तक हो
मैं ज्यूँ ही दरवाज़ा खोलूँ
तुम सफ़ेद कुर्ता पहने
मेरी आँखों में दिखो
पर कुण्डी को जैसे मौत आई थी
अड़ गयी वहीँ टेढ़ा-सा मुंह बनाए
मैं रसोई में भागी
पाँव वहीँ दरवाज़े पर छोड़
कहीं तुम चले न जाओ ये सोच कर
लौटी जब सरसों का तेल हाथ में लिए
और कुछ फर्श पर बिखेर कर
देखा के कुण्डी अब भी लगी थी
पर दरवाज़ा खुला था
मैं बाहर आई कोई नहीं था वहां
न तुम न तुम्हारी परछाई
कुछ था तो बस
मेरे सूट पर उभरे तेल के छीटें
जो कुछ खारे से थे...........
-(आरती)

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