कल चुपके से वो
मेरे
कमरे में आई
थी
गीली रात की हथेली पर
अपना पाँव रख
कर
मुझसे से छिपकर
खुद से छिपकर
आते ही बोली
आइना देखा है
कभी
मुझे तो खूब
बनाते हो
दाढ़ी क्यों नहीं बनाई
मैं बिस्तर पर पड़ा था
किसी सोई रूह
की तरह
सफ़ेद चादर ताने
सर से पाँव
तलक
मेरे कानो में जैसे
कोई मंतर फूँका
था उसने
मैं झट से
उठा
वो सामने बैठी थी
मेरे
अपनी मुलायम हथेली में
मेरी रुखी नज़्म
लिए
आँखों से गिराए थे उसने
चंद भीगे लफ्ज़
मेरी रुखी नज़्म
पर
फिर उसे चूमा
और लौट गयी
दबे पाँव
फर्श पर पड़े
सभी
पदचिन्ह मिटा कर
एक अरसे बाद मेरी
शब गुज़री थी
मेरे सिरहाने वही नज़्म
पड़ी थी
जिसमें तेरा मिसरा
भी जुड़ चुका
था
....
-[आरती]

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