Tuesday, September 24, 2013

रुखी नज़्म







कल चुपके से वो मेरे

कमरे में आई थी



गीली रात की हथेली पर

अपना पाँव रख कर

मुझसे से छिपकर

खुद से छिपकर



आते ही बोली

आइना देखा है कभी 

मुझे तो खूब बनाते हो

दाढ़ी क्यों नहीं बनाई



मैं  बिस्तर पर पड़ा था

किसी सोई रूह की तरह

सफ़ेद चादर ताने

सर से पाँव तलक



मेरे कानो में जैसे

कोई मंतर फूँका था उसने

मैं झट से उठा

वो सामने बैठी थी मेरे

अपनी मुलायम हथेली में

मेरी रुखी नज़्म लिए



आँखों से गिराए थे उसने

चंद भीगे लफ्ज़

मेरी रुखी नज़्म पर

फिर उसे चूमा

और लौट गयी दबे पाँव

फर्श पर पड़े सभी

पदचिन्ह मिटा कर



एक अरसे बाद मेरी

शब गुज़री थी

मेरे सिरहाने वही नज़्म पड़ी थी

जिसमें तेरा मिसरा भी जुड़ चुका  था ....

-[आरती]

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