पलकों ने चखा समंदर
गालों पर बरसी हैं बूँदें
एक दुआ भर ही तो उछाली थी
उस नीली-झीनी चादर की ओर
सच है ! मनमर्ज़ियों के आगे
कहाँ टिका है कोई
किसी दर्द की बारिश में
कहाँ रुका है कोई
भीगना, बहना और डूब जाना
बस ! यही तो लिखा है...
पर मन तो फ़िर भी पनाह ढूंढता है
एक दूसरे मन की
दर्द…
एक दूसरे दर्द की
दुआ...
एक दूसरी दुआ की
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आरती
वो इज़हार जो हऴक मेँ डूब गया वो लफ़्ज़ जो काग़ज़ पर नहीँ गिरे वो धुन जो किसी गीत मेँ नहीँ ठली वो चिट्ठियाँ जो जेबोँ मेँ सिलतीँ रहीँ वो आँखेँ जिसमेँ महबूब का अक्स ना उतरा वो इंतज़ार जिसे मंज़िल न मिली वो बारिश जो बहती रही अंदर
सांसोँ के स्पन्दन पर स्मृति का थिरकना स्मृति की भीगीँ पोरोँ का आँखोँ मेँ उतर आना आँखोँ से बहकर ठिठक जाना रूमाल की कोर पर.. नहीँ! इस यात्रा मेँ तुम.. कहीँ नहीँ थे इस यात्रा मेँ तुम ही तुम थे.. (आरती)
मुझमेँ तुम्हारी स्मृति का उतरना किसी पहाड़ी पर खड़े होकर नीचे देखने जैसा है जैसे हारमोनियम की अस्पर्शय धुन का हवा मेँ चुपचाप बहना जैसे अदृश्य उँगलियोँ का पीठ पर कोई कविता लिख जाना जैसे बोतल मेँ संजोयी पिछली बारिश का हथेलियोँ से छूट जाना... -आरती