Sunday, June 8, 2014

साल गिरते रहते हैं, ज़िन्दगी के तोशाखाने से..
यादों का चेहरा बूढ़ा बरगद हो जाता है।।

- [आरती]
(29 Aug 2013)
ये एक लम्बी सड़क है
एक तन्हा रास्ता
मुझे अकेले ही चलना है इस पर
धूप कड़ी है पर बादलोँ की उम्मीद भी है
कई मीलोँ और शहरोँ का फ़ासला सही
ज़हनी, रूहानी तौर पर हम हमेशा जुड़े रहेँगे
हाँ! ये रास्ता मैँने चुना है
मैँ हारूँ या जीतूँ 
ज़िम्मा.. सिर्फ मेरा है....

-(आरती)
(30 Nov 2013)
रज़ाई की सफेद तहोँ मेँ दुबकी

कँपकँपाती दो पलकेँ

पोर-पोर स्मृतियोँ की गँध

साँस-साँस खाली....

-आरती
सपनोँ के कैनवास पर हर रात
एक चेहरा गढ़ती हैँ आँखेँ

जहाँ पलकोँ का ब्रश कल्पना के रंगोँ मेँ डूबकर 
तुम्हारी श्वेत-श्याम छवि को रंगता है, आकार देता है

और इस तरह से फ़िर
सृजन होता है तुम्हारा.......

-आरती

एहसासोँ का चेहरा

कैलेँडर पर एक तारीख़ को क़ैद किया था तुमने

नीले रंग की स्याही से 
घेर ली थीँ..
उस दिन की यादेँ

ताकि फांद न पाएँ 
ज़हन की दिवारेँ

मेज़ पर बेतरतीब
बिखरी पड़ी हैँ
तुम्हारी-मेरी बातेँ

ठीक एक बरस पुरानी चाय से
धुआं उठता देख रही हूँ

अख़बार की कतरनोँ पर
तुम्हारी उँगलियोँ की छाप
आज भी सहला जाती हैँ

सफ़ेद कुर्ते पर
स्याही के छीँटेँ
कुछ और गहरा गए हैँ

आसमानी बूँद बनकर
आज फ़िर
मेरे एहसासोँ का चेहरा
छू गए हो तुम..

(आरती)

मैँ अक्सर तुम्हेँ याद करता हूँ...

मैँ अक्सर तुम्हेँ याद करता हूँ...

जब अपने कुर्ते की बाँह मोड़ते हुए
तुम्हारा हाथ मेरी कलाई थामे नहीँ दिखता

जब बाज़ार से ग़ुज़रते हुए मोगरा महक उठता है
और तुम्हारी ज़िद्द साथ नहीँ होती

मैँ अक्सर तुम्हेँ याद करता हूँ...

जब रेत पर चलते हुए लहरेँ पोँछ देती हैँ मेरा पता
और तुम्हारे पाँव साथ नहीँ होते

जब छत पर लेटे हुए चाँद मुझे घूरता है
और तुम्हारी गाई नज़म मेरे साथ नहीँ होती

मैँ अक्सर........
तुम्हेँ याद करता हूँ!

-आरती
साँस के पहले सिरे से
देह के छूट जाने तक
मैँ तुम्हारा इंतज़ार करँगी..

उस दिन 
कुछ पल ही सही
अपनी जेब ख़ाली कर आना..

फ़ेँक आना वो तमाम सिक्के
जिनकी गूँज मेँ ग़ुम हो गई

हमारे रिश्ते की खनक....

-आरती

(jan 21/2014)