Sunday, June 8, 2014

तुम्हारी सालगिरह नज़दीक है
सोचता हूँ क्या दूँ तुम्हेँ

बायीँ जेब कुछ सीली लगती है
तुम्हारे आँसू रखे थे वहाँ
गँगा मेँ बहा आऊँगा
ताकि लौट न पाएँ तुम्हारी आँखोँ तक

दायीँ जेब से गुलाब की दो पंखुड़ियाँ निकलीँ
तुम्हारी मुस्कान जो रखी थी वहाँ
इसे मिट्टी की सबसे नम तहोँ मेँ बोऊँगा
फ़िर... मैँ तुम्हेँ भेँट करुँगा वो..
ख़ुशपेड़...

-आरती
तेरे हाथों का मस अब भी 
मेरी शामों में घुला लगता है

जब छत पर धूप की गिरहें बंध रहीं होती हैं 
तू गुलाबी आँचल 
मेरी तार पर बिछाए दिखती है

मैं अपने चेहरे पर उसे पहन लेता हूँ 
दो घड़ी ही सही जी लेता हूँ..........

-------------------------------------
-आरती
३०/१/२०१४

प्रेम

प्रेम
उसके लिए स्वेटर बुनते हुए 
सलाईयों पर याद का टिक जाना 
और फन्दों का छूट जाना

प्रेम 
उसकी लिखी नज़्में सुनते हुए 
होंठों का मुस्कराना
और आँखों का छलक जाना

प्रेम
चूल्हे पर चाय चढ़ाकर
भांप में उसका चेहरा बनाना
और बर्तन का जल जाना

प्रेम
चुपके से उसकी डायरी चुराकर
उसमें ख़त रखना
और अपने नाम का ख़त मिल जाना

-(आरती)
१४/२/२०१४
जब सांस डूब रही होती है
ख़ामोशी की स्याही में

जगमगाने लगता है एक जुगनू 
तेरी आवाज़ की रौशनाई से.......

(आरती)
जब भीड़ में ख़ुद को खो देती हूँ 
मैं तुम्हें ढूंढती हूँ

जब वायलिन पर कोई उदास धुन बज रही होती है
मैं तुम्हें सुनती हूँ 

जब बारिश के बाद भी पोरें सूखी रह जाएँ
मैं तुम्हें बुनती हूँ 

जब चाँद दमकने लगता है रात के चेहरे पर 
मैं तुम्हें चुनती हूँ

जब रंग बेरंग लगने लगें कैनवास पर
मैं तुम्हें जन्मती हूँ.......

-आरती
१/३/२०१४

होता है न कभी

होता है न कभी 
कोई गीत गुनगुनाते हुए 
अल्फ़ाज़ों का गुम हो जाना...

या कभी पियानो पर उँगलियाँ पड़ते ही
किसी गीत का बुन जाना...

होता है न कभी 
नींद में चलते हुए 
किसी ख्वाब का खो जाना... 

या कभी जागते हुए
उस ख्वाब का सिरा मिल जाना...

होता है न कभी
अकेले में यूँ ही बड़बड़ाना
उसकी तस्वीर से बतियाना...

या कभी उसका हाथ थामे
दूर तक चलते जाना चुपचाप
य़ू ही..बेमतलब...बेमकसद......

होता है न कभी............

(आरती)
१३/३/१४
जब एक रचनाकार अपने ही रचे किसी किरदार से प्रेम करने लगता है..तो वो वास्तविकता और भ्रम के बीच किसी पैंडुलम की तरह झूलता रहता है..
वो जानता है कि उसका अस्तित्व सिर्फ किताब के पन्नों के बीच सीमित है..या फिर उसके भीतर..मन के किसी कोने में महकती कस्तूरी की भाँति..जिसे वो बाहर की दुनिया में खोजता रहता है..

ऐसा ही तो होता है.....एकतरफा प्रेम.......
फ़र्क़ बस इतना है कि एक भ्रम होकर भी वास्तविक है..और दूसरा वास्तविक होकर भी भ्रम है...

(आरती)