अपनी दो हथेलियोँ से मैँने
अपनी दो आँखेँ ढंक ली हैँ
पर कुछ है जो अनवरत बढ़ता जाता है और दिखाई नहीँ देता
इंतज़ार, प्रेम के गर्भ मेँ फलता शिशु है।
(आरती)
अपनी दो आँखेँ ढंक ली हैँ
पर कुछ है जो अनवरत बढ़ता जाता है और दिखाई नहीँ देता
इंतज़ार, प्रेम के गर्भ मेँ फलता शिशु है।
(आरती)
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