Sunday, December 13, 2015

तुम न होती तो

अक्सर हम लड़कियाँ
इधर-उधर बिखरे सामान को
समेटती रहती हैं
बिखराव पसंद नहीं हमें शायद
पर अंदर जो बिखराव है,
क्या कभी उसे समेटती हैं हम
मन की  दराज़ में जाने कितनी बंद डायरियां
उलझी पड़ी होती हैं
अपनी ही अनकही में किसी अधबुने स्वेटर सी
क्या कभी टटोला है तुमने किसी ऐसे मन को
जिस पर टंगे हों उजले चाँद से पर्दे
और भीतर अमावस हो
अगर कर सको कुछ
तो इतना करना
एक सफ़ेद मुलायम ख़रगोश
उसकी गोद में रख देना
और कहना
कुछ देर के लिए भूल जाओ
कि तुम एक लड़की हो
भूल जाओ कि तुम्हे ही समेटना है सब कुछ
बस यही याद रखना कि
तुम न होती तो
ये मन नहीं होता
संवेदना नहीं होती
प्रेम नहीं होता
और मैं नहीं होता
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आरती

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