Monday, June 1, 2015

प्रार्थना बनकर गिरना चाहती हूँ

कितनी ही नींदें जागी हूँ....
अब जाग कर सोनी है मुझे
कई-कई नींदें

पड़ना है तुम्हारे प्रेम में फ़िर-फ़िर
ताकि फ़िर-फ़िर ठुकरा दी जाऊं

प्रार्थना बनकर गिरना चाहती हूँ
ईश्वर के हाथों से
ताकि तय कर सकूँ अपनी टूटन की हदें

बेतरह चूमना चाहती हूँ येशु की हथेलियाँ
ताकि चख सकूँ पीड़ा

दांत से खींचकर निकाल देना चाहती हूँ
लहू से सनी कीलें
येशु और प्रेम की उन कोमल हथेलियों से
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आरती

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