टूटने से पहले
वो भिखरी तो होगी
पतझड़ के किसी भूरे पत्ते की तरह
झरी भी होगी
किसी ने हथेली में न थामा होगा
उसका सिला चेहरा
पोंछी नहीं होंगी तसल्ली के लिहाफ से
उसकी धुंधलकी आँखें
मेज़पोश के नीचे दबी उसकी आह!
क्या सुनी होगी किसी ने
घर की बरसाती पर
कोसा होगा उसने खूब
उस चाँद को.…
पिघलते गुस्से से भरी होंगी
कागज़ों की छाती
बारिश के पानी में छिपाए होंगे
पलकों पर टंगे समंदर
तितली के कानो में कही होगी
सबसे उदास कविता
पियानो की सफ़ेद- काली धारियों पर
बजाया होगा समय का सबसे भीगा प्रेमगीत
-----------------------
आरती
वो भिखरी तो होगी
पतझड़ के किसी भूरे पत्ते की तरह
झरी भी होगी
किसी ने हथेली में न थामा होगा
उसका सिला चेहरा
पोंछी नहीं होंगी तसल्ली के लिहाफ से
उसकी धुंधलकी आँखें
मेज़पोश के नीचे दबी उसकी आह!
क्या सुनी होगी किसी ने
घर की बरसाती पर
कोसा होगा उसने खूब
उस चाँद को.…
पिघलते गुस्से से भरी होंगी
कागज़ों की छाती
बारिश के पानी में छिपाए होंगे
पलकों पर टंगे समंदर
तितली के कानो में कही होगी
सबसे उदास कविता
पियानो की सफ़ेद- काली धारियों पर
बजाया होगा समय का सबसे भीगा प्रेमगीत
-----------------------
आरती
No comments:
Post a Comment