Tuesday, August 4, 2015

काश !

रात भर आँख की खिड़की पर
लटका रहा चाँद

पलकें थीं कि मूंदने का नाम ही न लें

ये चाँद इतना दूर क्यों निकलता है ?

क्या मेरी तरह उसे भी अच्छा लगता है…
यूँ तन्हा होना 

कॉफ़ी के सिप अकेले भरना

बालकनी की रेलिंग पर अपनी ठोडी टिकाए
सड़क पर आते-जाते पैरों को देखना

बारिश में बूंदों के कांच सोख लेना

काश ! उसने कहा न होता कि
प्यार एक सपना है

मैं उस सपने को न जीती

काश ! उसने कह दिया होता कि
हरी आँखें पसंद हैं उसे

काश ! कुछ न कहा होता उसने
काश ! सब कह दिया होता उसने
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आरती





   

Monday, August 3, 2015

संवाद सेतु

जानते हो
मैँने तुम्हारी हर कविता को सहेज कर रखा है
वो जो काग़ज़ पर उतरीँ
वो जो जला दी गयीँ
वो जो तुमने ख़ुद से कहीँ
वो जो तुमने मुझसे कहीँ
सच! कविता तुम्हारे और मेरे बीच का
संवाद सेतु है
आरती

आख़री आस

पहाड़ पसंद है उसे
इस दफा जब वो पहाड़ की यात्रा पर जाए
उसे कहना
नदी की हथेली पर जो एक पलक रखी है
फ़ूँक आए उस आख़री आस को...
आरती

Sunday, July 26, 2015

अबोला अंश

अक्सर किसी ठोस आवरण के नीचे
छिपी होती हैं कोई बेहद मख़मली चीज़
किसी स्मृति चिन्ह की तरह अंकित
उस व्यक्ति का प्रेम जो रह गया हो अबोला
जिसे पीड़ा के अव्यक्त क्षणों में
संकुचित कर भरने दिया हो भीतर ही भीतर
प्रतीक्षा की सभी सीमाओं के पार
एक अनदेखी शाम जहाँ गिरती हो
क्षितिज का वो आख़री छोर
जहाँ सत्य अर्धसत्य के बीच के भ्रम टूटते हों
वहाँ एक विशाल शिला के पीछे
आज भी उगता है किसी के हिस्से का वो
अबोला अंश
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आरती

Wednesday, July 22, 2015

कविता

कविता,
'मैँ' और 'मन' के बीच के 
सबसे सुच्चे संवाद हैँ...
आरती

रुँधा कंठ

देह की परतों के पीछे एक जगह है
जहाँ ठहर गया है कुछ
पीड़ा , प्रेम , स्मृति
जाने कितने रसायनों से गुंथी
एक शक्ल , एक नाम  के रूप में

मन पारदर्शी नहीं…
जो दिखा पाता अपनी आहत आत्मा
सुना पाता कैसी होती है पीड़ा की ध्वनि

पर ये धुनें कहाँ होती हैं कर्णप्रिय !
क्या कोई समझ पाता है
किसी उदास कविता के पीछे की कथा

सब कुछ अपनी गति से चलता है…
बस ! मन किसी छोटे बच्चे की तरह
पड़ा रहता है झूले में...असहाय
अपना रुँधा कंठ लिए।
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आरती

Sunday, July 19, 2015

मृत्यु को प्राप्त

अपने  इस खोल को भेदा है मैंने
अपनी ही दीवारें तोड़ी हैं
अभिमन्यु बन नहीं हो सकती मैं हर बार…
 मृत्यु को प्राप्त
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आरती