Tuesday, June 24, 2014


























किसी की याद को हम कितना सहेज कर रखते हैं न

जैसे समंदर से लौटते  हुए पैरों की उँगलियों के बीच लगी रेत
बचा लाये हों

या  मुलाक़ात की शाम के  उस अमलतास का पीला रंग
अपने कंगन में मिला लाये हों  

जैसे सालगिरह के दिन उसकी दी दुआ बाँध ली हो कसकर
अपने दुपट्टे की कोर से....

कैसे ज़हन की किताब में उसे बुकमार्क बनाकर रख लेते हैं न
उस गुलाब की तरह जो नहीं दे पाये थे उसे

पर तब क्या जब वो सिर्फ भ्रम हो!!
फ़िर भी याद बनकर बीत रहा हो आपमें पल-पल.…
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आरती
२५/६/१४




































Saturday, June 21, 2014

भटका हूँ क़तरा-क़तरा, पुर्ज़ा-पुर्ज़ा मै
कभी तो तू मुझे मुझसे मिला दे..
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आरती
२१/६/१४ 

Monday, June 16, 2014

बहुत ग़ुज़र कर भी..
कुछ तो है जो ठहर जाता है

उसके जाने के बाद मुलाक़ातोँ की पीठ पर जैसे 
इंतज़ार की खरोँचेँ..

-आरती

Thursday, June 12, 2014

जब हम प्रेम में होते हैं

कभी प्रेम में होकर देखो

कि जब हम प्रेम में होते हैं
तो सिर्फ प्रेम में नहीं होते

प्रेम को अपने तक रखने की पीड़ा
तब एक खोल की तरह मन को घेरे रहती है

डायरी के पन्नों की तरह आप भरे रहते हैं
और हलक  कोरा जिल्द हो जाता है

तब आप ख़ाली हो जाना चाहते हैं
ज़ोर से चिल्लाना चाहते हैं

पर होंठ भींच लेते हैं कस कर
आँखें समंदर हो जाती हैं
और हँसी खारी…

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आरती
(१२/६/१४)


Wednesday, June 11, 2014


















किसके निशाँ ढूँढता है ऐ मुसाफिर
सफर में ख़ुद ही बनाने होंगे तुझे अपने…
पदचिन्ह।
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आरती

काश! अहसास पढ़े जा सकते उँगलियोँ की पोरोँ पर..
ब्रेल लिपि की तरह।
-आरती

Monday, June 9, 2014

तुम्हे बाँध पाना कहाँ आसान है
देखो! दुआओं में भी बंध न पाए तुम
मन्नतों के धागे ज़्यादा कस दिए थे शायद..
-आरती