Friday, May 15, 2015

लड़की अपना पहला प्रेम कभी नहीँ भूलती

लड़की अपना पहला प्रेम कभी नहीँ भूलती
प्रेम, जिसे महसूसना
हथेली मेँ जुगनु बंद करने जैसा है
एक रौशनी एक नूर
अंदर और बाहर...
पर कभी ये रौशनी अलाव भी हो जाया करती है
फ़िर भी हथेली जलती नहीँ.. अमलतास के फ़ूल हो जाती है
तुम अपने नाम की ही तरह गहरे हो
मेरे लिए प्रेम की परिभाषा
आगाज़ और अंत तुम ही हो
(आरती)

रतजगी

रतजगी,
शिशु की आँखोँ का विस्मय
अनसुलझा..अटूट 
आरती

प्रेम का पर्याय

पीड़ा, प्रेम का पर्याय होती हैँ
जिनके होने मेँ ही
आप का होना है
आरती

गिरह

कुछ देर पहले
प्रेम ने करवट ली थी
रुह छिल गयी थी उसकी
अपनी ही बांधी गिरहोँ से...
आरती

ख़ालीपन

अपने भीतर का ख़ालीपन 
उसने अपने जूतोँ मेँ भर रखा है
जब चलती है,
फर्श पर निशान नहीँ छोड़ती
कहीँ उसका ये ख़ालीपन 
किसी और को ना छू जाए
(आरती)

टूटन नहीँ..जुड़ाव है

संवाद का टूटना
एक विकल्प है
जिसे हम चुनते हैँ 
या शायद हम चुने जाते हैँ इसके हाथोँ
इसकी टूटन हमारी टूटन नहीँ..जुड़ाव है
अबोले अनदेखे
तुम और मैँ का...
आरती

कभी जो खो जाऊँ मैँ..

कभी जो खो जाऊँ मैँ
ढूँढना मत मुझे
मेरी कविताओँ मेँ
न अधूरी कहानियोँ के खुले सिरे मेँ
न स्मृति के बुलबुले मेँ तैरती मिलुँगी
न यथार्थ और भ्रम के बीच झूलते किसी स्वप्न मेँ
मैँ मिलुँगी तुम्हेँ
तुम्हारी ही अनकही मेँ
(आरती)