Thursday, May 8, 2014

बारी तुम्हारी है…

इन दिनों बालकनी में नहीं उतरा करतीं सुबहें

कोई छिप गया है कहीं जाकर

बिना मुझे बताए कि ढूँढने की बारी थी मेरी

बता दिया होता तो वक़्त और जगह तय कर ली होती
खेल की…

सुबह अख़बार पढ़ने, नाश्ता कर लेने के बाद

या अलसायी  दोपहरी में नींद की झपकियों के बीच…

दो कमरों से लेकर स्टडी तक

या बरसाती से लॉन तक…

तुम जानते थे तुम्हें आसानी से ढूँढ लूंगी मैं

पीछे से दबे पाँव आकर ढप्पा कर दूंगी तुम्हें…

देखो ! बालकनी में पड़ी अख़बार कैसे फड़फड़ा रही है

कुल्हड़  की चाय पसंद है न तुम्हे

चख के बताना तो कैसी बनी है.…

जल्दी आओ खेल का वक़्त हो चला है

अब बारी तुम्हारी है………

-(आरती)
८/५/२०१४  






Friday, May 2, 2014

एक सीध















तुम फुर्सत तलाशते हो
मैं मसरूफ़ियत ढूँढती हूँ

तुम घिरे रहते हो आदम की भीड़ से
मैं जुटी रहती हूँ अकेलेपन का चक्रव्यूह भेदने में

तुम फोटो फ्रेम में अपनी शोहरत निहारते हो
मैं रिश्तों के कोलाज में फिट बैठती हूँ

तुम दीवार खड़ी करते हो
मैं पुल बनाती हूँ

तुम शिखर पर केवल अपनी जीत का परचम लहराते हो
मैं सबको साथ लिए चलना चाहती हूँ अंत तक

तुम्हें जेब में सिक्कों की खनक लुभाती है
मुझे घर में गूंजती किलकारियाँ

तुममें भुला देने का हुनर है
मुझमें यादें संजोने का शग़ल

हम दोनों के सिर पर एक ही छत है
मन में एक ही सवाल -

" क्या दो उलट लोगों के बीच
एक सीध नहीं बंध सकती ?? "

-आरती
२/५/२०१४ 

Tuesday, April 22, 2014

आस का एक सितारा




आईने में दो अक्स
अब नहीं दिखा करते एक साथ..

एक चेहरा ज़मीन पर पड़ा रहता है
मिट्टी में लतपथ

दूसरा रेल की पटरियों पर
दिन गिना करता है

एक चेहरे की एक जोड़ी आँख
टिकी रहती है देहरी पर

दरवाज़े पर मूँह लटकाये लटकी रहती है
इंतज़ार की सांकल
उस हथेली का स्पर्श पाने को

चमकीली आस का एक सितारा
टाक गया था दूसरा चेहरा

एक चेहरे की दो भौहों के ठीक...
बीचों-बीच

 -आरती
२२/४/१४ 

Tuesday, April 8, 2014

चुप्पियाँ

लफ़्ज़ ढूंढते हुए अक्सर
चुप्पियाँ हाथ लगती हैं.…

होंठों पर बिछी
सूखी पपड़ियों की शक्ल में

आँखों की  कोर में अटके
मोती की शक्ल में

भरी महफ़िल में मेज़ पर सजे
ख़ाली गिलास की शक्ल में

बरामदे में हिलती आराम कुर्सी
दीवार पर टंगी तस्वीर की शक्ल में

पांव से खुर्ची मिटटी
अलमारी में घुंघरुओं की शक्ल में

या फ़िर
मुरझाए चेहरे पर
कान-से-कान तक फ़ैली मुस्कान की शक्ल में

लफ़्ज़ ढूंढते हुए अक्सर
चुप्पियाँ हाथ लगती हैं.…

-आरती
(८/४/१४)




Tuesday, April 1, 2014




दो अलग-अलग शहरों को
एक सड़क जोड़ती है
उम्मीद की..

तुम्हारे शहर में जब उगता है सूरज
तब धूप बिछती है मेरे शहर में..

तुम्हें ऊँचाई पसंद है न
पर्वत-सी विशाल…
मेरी जड़ें गहरी जमी हैं
ज़मीन में
 
पर दोनों का रंग एक ही तो है
भूरा रंग....पर्वत और मिटटी का

आँखों से गिरे मोती का
चेहरे पे बिखरी मुस्कान का
तुम्हारे और मेरे प्रेम का

क्या शहरों का फासला
हमारा ही बनाया है??

काश!! कि तुम सुन पाते
बातों की बंद तहों में मेरी
ख़ामोशी को.…
 
काश!! कि मैं पढ़ पाती
तुम्हारी कही में छिपी
अनकही को…

जानती हूँ तुम तक पहुंचना
आसान नहीं

पर वादा करो…
जो एक सीढ़ी मैं चढ़ूँ
एक सीढ़ी उतर आना तुम...

-आरती
(२/४/१४)

Sunday, March 30, 2014













मेरी गली में इन दिनों 
फालसे वाला नहीं आता 
तुम्हारे आता है क्या?


दूर नुक्कड़ से उसकी आवाज़ 
आज भी गूँज उठती है कानों में 
"काले-काले फालसे !!"


सुनते ही जीभ खट्टी हो जाती थी 
पर अब मन खट्टा हो जाता है 


खौलती अंगीठी के पास 
मिटटी में छिपी होती थी 
हमारी सारी दौलत उन दिनों

माँ के आँचल से चुराई अठन्नी
खेल में जीते रंग बिरंगे कंचे
हरे मखमल में लिपटा मोर पंख

सब फ़िज़ूल लगता है इन दिनों
जब मेरा माज़ी मुझसे रूठ गया है

अब न वो गली रही न नुक्कड़
न माँ रही न आँचल

रह गए हैं बस कुछ निशाँ
मेरी यादों की जेब में.......

-{आरती}

Thursday, March 27, 2014















एहसास के पोरों पर वो
अल्फ़ाज़ रफू करता है 

बहुत सलीके से फिर..
उन्हें ज़बान पर रखता है

ढलकने लगती हैं सुर्ख़ नज़में 
वक़्त के सफ़हों पर 

मैं उन नज़मों का लम्स चूमकर 
अपनी पेशानी पर रख लेती हूँ 

-आरती