दो अलग-अलग शहरों को
एक सड़क जोड़ती है
उम्मीद की..
तुम्हारे शहर में जब उगता है सूरज
तब धूप बिछती है मेरे शहर में..
तुम्हें ऊँचाई पसंद है न
पर्वत-सी विशाल…
मेरी जड़ें गहरी जमी हैं
ज़मीन में
पर दोनों का रंग एक ही तो है
भूरा रंग....पर्वत और मिटटी का
आँखों से गिरे मोती का
चेहरे पे बिखरी मुस्कान का
तुम्हारे और मेरे प्रेम का
क्या शहरों का फासला
हमारा ही बनाया है??
काश!! कि तुम सुन पाते
बातों की बंद तहों में मेरी
ख़ामोशी को.…
काश!! कि मैं पढ़ पाती
तुम्हारी कही में छिपी
अनकही को…
जानती हूँ तुम तक पहुंचना
आसान नहीं
पर वादा करो…
जो एक सीढ़ी मैं चढ़ूँ
एक सीढ़ी उतर आना तुम...
-आरती
(२/४/१४)
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