Tuesday, April 8, 2014

चुप्पियाँ

लफ़्ज़ ढूंढते हुए अक्सर
चुप्पियाँ हाथ लगती हैं.…

होंठों पर बिछी
सूखी पपड़ियों की शक्ल में

आँखों की  कोर में अटके
मोती की शक्ल में

भरी महफ़िल में मेज़ पर सजे
ख़ाली गिलास की शक्ल में

बरामदे में हिलती आराम कुर्सी
दीवार पर टंगी तस्वीर की शक्ल में

पांव से खुर्ची मिटटी
अलमारी में घुंघरुओं की शक्ल में

या फ़िर
मुरझाए चेहरे पर
कान-से-कान तक फ़ैली मुस्कान की शक्ल में

लफ़्ज़ ढूंढते हुए अक्सर
चुप्पियाँ हाथ लगती हैं.…

-आरती
(८/४/१४)




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