तुम फुर्सत तलाशते हो
मैं मसरूफ़ियत ढूँढती हूँ
तुम घिरे रहते हो आदम की भीड़ से
मैं जुटी रहती हूँ अकेलेपन का चक्रव्यूह भेदने में
तुम फोटो फ्रेम में अपनी शोहरत निहारते हो
मैं रिश्तों के कोलाज में फिट बैठती हूँ
तुम दीवार खड़ी करते हो
मैं पुल बनाती हूँ
तुम शिखर पर केवल अपनी जीत का परचम लहराते हो
मैं सबको साथ लिए चलना चाहती हूँ अंत तक
तुम्हें जेब में सिक्कों की खनक लुभाती है
मुझे घर में गूंजती किलकारियाँ
तुममें भुला देने का हुनर है
मुझमें यादें संजोने का शग़ल
हम दोनों के सिर पर एक ही छत है
मन में एक ही सवाल -
" क्या दो उलट लोगों के बीच
एक सीध नहीं बंध सकती ?? "
-आरती
२/५/२०१४

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