बुझती हुई आँखों में जैसे
मुस्कुराहट की डली है कोई
पिघलती है कभी खारी होकर
तो कभी ठहरे मर्ज़-सी...नब्जों में उतर आती है
मैं पूछती हूँ आख़िर दर्द क्या है? तेरा मर्ज़ क्या है ?
हर दफ़ा वो हौले से एक गेंद उछालती है
जो लुढ़क जाया करती है आँख के पाले से
और दर्ज मिलती है रुमाल के सफ़हे पर
एक और नज़्म....
गीले काजल की...
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आरती
मुस्कुराहट की डली है कोई
पिघलती है कभी खारी होकर
तो कभी ठहरे मर्ज़-सी...नब्जों में उतर आती है
मैं पूछती हूँ आख़िर दर्द क्या है? तेरा मर्ज़ क्या है ?
हर दफ़ा वो हौले से एक गेंद उछालती है
जो लुढ़क जाया करती है आँख के पाले से
और दर्ज मिलती है रुमाल के सफ़हे पर
एक और नज़्म....
गीले काजल की...
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आरती
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