मैंने किसी लम्हे तुम्हे
ख़ुद से इतना दूर किया कि
फ़ासले की क़ुर्बत और बढ़ गयी
वो जो एक नन्ही सी बात
अटकी पड़ी थी कब से हलक में
तालु से ज़रा और चिपक गयी
ख़ुद से इतना दूर किया कि
फ़ासले की क़ुर्बत और बढ़ गयी
वो जो एक नन्ही सी बात
अटकी पड़ी थी कब से हलक में
तालु से ज़रा और चिपक गयी
खीसे में रखी थी ज़रा मोड़कर याद तुम्हारी
सोचा था गुज़र बसर हो जाएगी
जाने कब ज़रा और मुड़ तुड़ गयीं
अब बस कुछ सिलवटें है बाक़ी
और एक बोसा है किसी बीज सा
कि रह रह कर उग आता है मेरी हथेली पर
एक सुर्ख गुलाब तुम्हारी शक़्ल का...
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आरती
सोचा था गुज़र बसर हो जाएगी
जाने कब ज़रा और मुड़ तुड़ गयीं
अब बस कुछ सिलवटें है बाक़ी
और एक बोसा है किसी बीज सा
कि रह रह कर उग आता है मेरी हथेली पर
एक सुर्ख गुलाब तुम्हारी शक़्ल का...
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आरती
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