सोचती हूँ
काश! तुम्हारी भौँह पर लगे टाँकोँ को मैँ
छू सकती बस एक बार
अपनी उँगलियोँ से
कितना मासूम होता है न
प्रेम की सोच का चेहरा
पर जिस तरह हर प्रेम कहानी का नहीँ होता सुखाँत
उसी तरह साहिर मेरा न हुआ
और हर अमृता को इमरोज़...
नसीब नहीँ होते
(आरती)
काश! तुम्हारी भौँह पर लगे टाँकोँ को मैँ
छू सकती बस एक बार
अपनी उँगलियोँ से
कितना मासूम होता है न
प्रेम की सोच का चेहरा
पर जिस तरह हर प्रेम कहानी का नहीँ होता सुखाँत
उसी तरह साहिर मेरा न हुआ
और हर अमृता को इमरोज़...
नसीब नहीँ होते
(आरती)
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